नई दिल्ली : लोकसभा में ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने पर विशेष चर्चा ने राजनीतिक तापमान को चरम पर पहुंचा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहस की शुरुआत करते हुए कांग्रेस पर ‘तुष्टिकरण’ का आरोप लगाया, तो वहीं मुस्लिम सांसदों ने धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देकर गीत गाने से साफ इनकार कर दिया।
AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी, सपा की इकरा हसन और जेकेंसी के आगा सैयद रूहुल्लाह ने कहा कि गीत के कुछ हिस्से इस्लाम की एकेश्वरवाद की भावना के खिलाफ हैं, जहां मातृभूमि को देवी दुर्गा के रूप में पूजने का उल्लेख है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मौलाना अरशद मदनी ने तो यहां तक कह दिया कि ‘मरना मंजूर है, लेकिन शिर्क (बहुदेववाद) नहीं’। विपक्ष ने इसे ‘मुस्लिम विरोधी राजनीति’ का हथियार बताया, जबकि बीजेपी ने इसे ‘राष्ट्रभक्ति का प्रमाण’ कहा।
चर्चा के दौरान सदन में हंगामा भी हुआ। कुछ सांसदों ने आगा सैयद को ‘पाकिस्तान चले जाओ’ के नारे लगाए, जिस पर स्पीकर ने चेतावनी दी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि गीत को राष्ट्रगान जितना सम्मान मिलना चाहिए और इसे मौलिक कर्तव्यों में जोड़ने का प्रस्ताव रखा। कांग्रेस की प्रियंका गांधी ने बहस को ‘विभाजनकारी’ बताते हुए कहा कि यह असल मुद्दों- महंगाई, बेरोजगारी- से ध्यान भटकाने की चाल है। पीएम मोदी ने नेहरू पर निशाना साधते हुए कहा, “कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के दबाव में गीत के छंद काटे, जो देश विभाजन का बीज बने।”
मुस्लिम सांसदों के मुख्य तर्क: क्यों नहीं गा सकते ‘वंदे मातरम’?
मुस्लिम नेताओं ने स्पष्ट किया कि उनका देशभक्ति पर कोई सवाल नहीं, लेकिन धार्मिक विश्वासों के कारण पूर्ण गीत गाना संभव नहीं। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) का हवाला दिया।
- असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM): “यह वतन हमारा है, हम कहीं नहीं जाएंगे। लेकिन मुसलमान मां या कुरान की इबादत नहीं करते। इस्लाम में अल्लाह के सिवा कोई खुदा नहीं। देशभक्ति का सर्टिफिकेट मत मांगिए।” ओवैसी ने कहा कि गीत के बाकी छंदों में दुर्गा-लक्ष्मी जैसे देवी-देवताओं का वर्णन शिर्क (बहुदेववाद) को बढ़ावा देता है।
- इकरा हसन (सपा, कैराना): “मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाकर समुदाय को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी ने भी केवल पहले दो छंदों को स्वीकार किया था। जबरदस्ती गाना धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है।” उन्होंने बीजेपी से पूछा, “क्या वाजपेयी जी तुष्टिकरण कर रहे थे?”
- आगा सैयद रूहुल्लाह (जेकेंसी, श्रीनगर): “वंदे मातरम आप गाइए, हमें दिक्कत नहीं। लेकिन हम गा नहीं सकते। सरकार राष्ट्रवाद को हथियार बनाकर मुस्लिम पहचान को कंट्रोल कर रही है। बुलडोजर कार्रवाई और यह बहस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। असहमति को देशद्रोह मत बताइए।” उनके बयान पर सदन में नारेबाजी हुई।
- मौलाना अरशद मदनी (जमीयत उलेमा-ए-हिंद): एक्स पर पोस्ट में कहा, “किसी के गाने पर आपत्ति नहीं, लेकिन मुसलमान केवल अल्लाह की इबादत करता है। वंदे मातरम का अर्थ ‘मां, मैं तेरी पूजा करता हूं’ है, जो हमारी आस्था से टकराता है। मर जाना स्वीकार, लेकिन शिर्क नहीं।”
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1882 में ‘आनंदमठ’ उपन्यास में लिखा गया ‘वंदे मातरम’ स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना। 1905 के बंगाल विभाजन के दौरान हिंदू-मुस्लिम दोनों ने इसे नारा बनाया। लेकिन 1937 में मुस्लिम लीग ने विरोध किया, क्योंकि बाद के छंदों में मातृभूमि को दुर्गा-काली के रूप में चित्रित किया गया है। कांग्रेस ने राष्ट्रीय एकता के लिए केवल पहले दो छंदों को अपनाया। 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत घोषित किया गया, लेकिन गाना अनिवार्य नहीं। रबींद्रनाथ टैगोर और गांधीजी ने भी संक्षिप्त रूप का समर्थन किया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: विभाजन या एकता?
- बीजेपी: अमित शाह ने राज्यसभा में कहा, “गीत बंगाल तक सीमित नहीं, सीमा पर जवान इसे नारा बनाते हैं। कांग्रेस ने लीग के आगे झुका।” अनुराग ठाकुर ने इसे ‘वेद, कुरान, बाइबल जितना पवित्र’ बताया।
- कांग्रेस: मल्लिकार्जुन खड़गे ने ‘वंदे मातरम’ गाकर शुरू किया, लेकिन कहा, “1937 का फैसला सर्वसम्मति से हुआ। नेहरू अकेले नहीं थे।” राहुल गांधी ने प्रियंका के भाषण का हवाला दिया।
- अन्य: शिवसेना के मिलिंद देवड़ा ने कहा, “एआर रहमान का संस्करण साबित करता है कि गर्वित मुस्लिम भी गा सकते हैं।” तृणमूल की महुआ मोइत्रा ने बीजेपी पर ‘बंगाल चुनावी ड्रामा’ का आरोप लगाया।