पुतिन की भारत यात्रा पर चीन का सकारात्मक बयान: ग्लोबल साउथ की ताकत पर जोर, अमेरिका की नींद उड़ी!

नई दिल्ली : रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की हालिया भारत यात्रा ने वैश्विक कूटनीति में नया मोड़ ला दिया है। 4-5 दिसंबर को दिल्ली पहुंचे पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुए द्विपक्षीय समझौतों ने भारत-रूस रिश्तों को नई ऊंचाई दी, तो चीन ने भी इस दौरे पर अपनी पहली आधिकारिक प्रतिक्रिया देते हुए इसे “सकारात्मक” बताया है।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि भारत, रूस और चीन जैसे उभरते देश “ग्लोबल साउथ” के प्रमुख स्तंभ हैं, और इन तीनों के मजबूत त्रिपक्षीय संबंध न केवल उनके अपने हितों में हैं, बल्कि क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और वैश्विक समृद्धि के लिए भी जरूरी हैं।

यह बयान ऐसे समय पर आया है जब अमेरिका भारत को रूस से तेल खरीदने और सैन्य सहयोग पर लगातार दबाव बना रहा है। पुतिन की यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया, साथ ही ऊर्जा, रक्षा और आर्थिक क्षेत्र में कई समझौते साइन हुए। चीन का यह बयान अमेरिकी दबाव के बीच एक स्पष्ट संदेश है कि एशिया की ये तीन ताकतें मिलकर पश्चिमी प्रतिबंधों का जवाब देंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे वॉशिंगटन को “मिर्ची लगेगी”, क्योंकि यह अमेरिका की “सैंक्शंस” नीति को चुनौती देता है।

चीनी प्रवक्ता गुओ ने सोमवार (8 दिसंबर) को मीडिया ब्रीफिंग में कहा, “चीन, रूस और भारत उभरती अर्थव्यवस्थाएं हैं और ग्लोबल साउथ के महत्वपूर्ण सदस्य। इनके मजबूत रिश्ते क्षेत्रीय व वैश्विक शांति के लिए लाभकारी हैं।” उन्होंने जोर दिया कि चीन भारत और रूस दोनों के साथ मिलकर सहयोग बढ़ाने को तैयार है, खासकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र में।

चीनी मीडिया ने भी पुतिन के दौरे को सराहा। ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि यह यात्रा “पश्चिमी दबाव के बीच भारत-रूस की एकजुटता का स्पष्ट संदेश” है। विशेषज्ञ ली हाईडोंग ने कहा, “इससे अमेरिका और पश्चिम की सैंक्शंस फेल हो जाएंगी।” इससे साफ है कि बीजिंग भारत-रूस की नजदीकी से चिंतित नहीं, बल्कि इसे त्रिपक्षीय फ्रेमवर्क में बदलना चाहता है—जो अमेरिका के लिए चुनौती है।

अमेरिका को क्यों लग रही मिर्ची?

अमेरिका ने हाल ही में भारत पर रूस से तेल खरीदने के लिए टैरिफ बढ़ाए हैं, जबकि खुद चीन सबसे बड़ा खरीदार है। पुतिन ने इसे खारिज करते हुए कहा, “अगर अमेरिका हमारा ईंधन खरीद सकता है, तो भारत क्यों नहीं?” ट्रंप प्रशासन की “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत भारत पर दबाव बढ़ा है, लेकिन मोदी सरकार ने साफ कर दिया कि रूस के साथ रिश्ते “रणनीतिक स्वायत्तता” का हिस्सा हैं।