PM मोदी ने गले लगाकर किया पुतिन का स्वागत, रूसी भाषा में भेंट की भगवद्गीता, 2011 में रूस में की जाने वाली थी बैन, मगर क्यों?

नई दिल्ली : भारत-रूस संबंधों को नई ऊंचाई देने वाले रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दो दिवसीय यात्रा के पहले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनका भव्य स्वागत किया। पालम एयरपोर्ट पर पहुंचते ही दोनों नेताओं ने गर्मजोशी से गले मिलकर एक-दूसरे का अभिवादन किया, जो दोनों देशों की गहरी दोस्ती का प्रतीक बना।

इसके बाद पीएम मोदी ने पुतिन को रूसी भाषा में अनुवादित भगवद्गीता की एक प्रति भेंट की, जिसे उन्होंने “दुनिया भर के करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत” बताया। यह उपहार न केवल सांस्कृतिक बंधन को मजबूत करता है, बल्कि 14 साल पहले रूस में इसी ग्रंथ पर लगाए गए बैन प्रयास की कड़वी यादों को भी ताजा करता है। आखिर क्यों रूस ने 2011 में भगवद्गीता को “उग्रवादी” करार देने की कोशिश की थी?

आइए जानते हैं इसकी पूरी कहानी।

बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय व्यापार, रक्षा सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक शांति पर विचार-विमर्श किया। पुतिन ने भारत को “सच्चा मित्र” बताते हुए कहा कि दोनों देशों के रिश्ते “किसी के खिलाफ नहीं” हैं। पीएम मोदी ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट साझा करते हुए लिखा, “राष्ट्रपति पुतिन को रूसी भाषा में गीता की प्रति भेंट की।
गीता की शिक्षाएं दुनिया भर के लाखों-करोड़ों लोगों को प्रेरित करती हैं।” दोनों नेता एक ही कार में सवार होकर 7, लोक कल्याण मार्ग पहुंचे, जहां पीएम ने पुतिन के सम्मान में निजी डिनर आयोजित किया। यह यात्रा यूक्रेन संकट और वैश्विक तनाव के बीच भारत की संतुलित विदेश नीति को मजबूत करने का महत्वपूर्ण कदम है।

स्वागत समारोह की झलकियां

  • गर्मजोशी का क्षण: पालम एयरपोर्ट पर उतरते ही पुतिन का पीएम मोदी ने गले लगाकर स्वागत किया। दोनों ने सांस्कृतिक प्रदर्शन का भी आनंद लिया, जिसमें भारतीय नृत्य और संगीत की झलकियां पेश की गईं।
  • उपहार का महत्व: भगवद्गीता का रूसी संस्करण न केवल धार्मिक ग्रंथ है, बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर का प्रतीक। पूर्व राजनयिक राजीव भाटिया ने इसे “सभ्यतागत मित्रता का संदेश” बताया, जो कठोर रक्षा और ऊर्जा सौदों से परे जाता है।
  • आज का एजेंडा: शुक्रवार को दोनों नेता प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता करेंगे, जिसमें ब्रह्मोस मिसाइल, एस-400 सिस्टम और परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं पर फोकस होगा। व्यापार लक्ष्य को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने पर भी चर्चा होगी।

यह उपहार 2011 के उस दर्दनाक अध्याय को भी उजागर करता है, जब रूस के साइबेरियन शहर टॉम्स्क के अभियोजकों ने भगवद्गीता (खासकर “भगवद्गीता अस इट इज” अनुवाद) को “उग्रवादी साहित्य” घोषित करने की मांग की। यह केस हिटलर की “माई स्ट्रगल” जैसी किताबों के साथ प्रतिबंधित सूची में डालने का प्रयास था। लेकिन क्यों? आइए समझें मुख्य कारण:

  • धर्मनिरपेक्षता का आरोप: अभियोजकों का दावा था कि ग्रंथ में गैर-हिंदू या “अविश्वासियों” का अपमान किया गया है, जो रूसी कानून के तहत “नफरत फैलाने वाला” माना जाता। इसमें भगवान कृष्ण और अर्जुन के संवाद को “भेदभावपूर्ण” बताया गया, जो कर्तव्य, धर्मयुद्ध और आत्मा की अमरता पर आधारित हैं।
  • रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च का प्रभाव: हरे कृष्णा आंदोलन (ISKCON) के सदस्यों ने इसे रूसी ऑर्थोडॉक्स चर्च की साजिश करार दिया। चर्च, जो रूस की प्रमुख धार्मिक संस्था है, नए धार्मिक समूहों को सीमित करने के लिए दबाव डाल रही थी। सोवियत के बाद रूस में चार मुख्य धर्मों (ईसाई, इस्लाम, बौद्ध, यहूदी) को विशेष दर्जा मिला, लेकिन अन्य संप्रदायों पर पाबंदियां लगाई गईं। ISKCON को “कन्वर्जन” फैलाने का आरोप लगाया गया।
  • राजनीतिक और सामाजिक तनाव: टॉम्स्क कोर्ट ने शुरुआत में आरोप खारिज कर दिए, लेकिन अभियोजकों ने पुनर्विचार की मांग की। रूसी विदेश मंत्रालय ने इसे “गलतफहमी” बताया, लेकिन मामला अंतरराष्ट्रीय विवाद बन गया। भारत में संसद ठप हो गई, विरोध प्रदर्शन हुए, और तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह ने मॉस्को से हस्तक्षेप की मांग की।
  • समापन और सबक: दिसंबर 2011 में टॉम्स्क कोर्ट ने केस खारिज कर दिया, और 2012 में रूसी मानवाधिकार आयुक्त व्लादिमीर लुकिन ने इसे “न्यायिक मूर्खता” कहा। 20 प्रमुख रूसी विद्वानों ने राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव और पीएम व्लादिमीर पुतिन को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की अपील की। यह घटना रूस में धार्मिक स्वतंत्रता की कमजोरियों को उजागर करती है, जहां नए आंदोलनों को “विदेशी प्रभाव” माना जाता।

आज पीएम मोदी का यह उपहार उस विवाद को पीछे छोड़ते हुए सकारात्मक संदेश देता है। यह दर्शाता है कि कैसे कूटनीति और संस्कृति मिलकर पुरानी कटुताओं को मिटा सकती है। भारत ने हमेशा गीता को “शांति और कर्मयोग का ग्रंथ” बताया, जो आइंस्टीन जैसे विचारकों को भी प्रेरित करता रहा।