नई दिल्ली : भारतीय रुपया आज फिर लुढ़का और डॉलर के मुकाबले 90 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया। मंगलवार को यह 90.13 तक गिरा, जो 2025 में अब तक की सबसे निचली स्तर है। विदेशी निवेशकों के बहिर्वाह और अमेरिका-भारत व्यापार संबंधों की अनिश्चितताओं के बीच यह गिरावट आई।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि रुपए की यह कमजोरी अर्थव्यवस्था के लिए पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। बल्कि, यह निर्यात, रेमिटेंस और नौकरियों को बढ़ावा देकर इकोनॉमी को बूस्ट दे सकती है। पूर्व नीति आयोग उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने ट्वीट कर कहा, “रुपए की गिरावट से मजदूर-गहन निर्यात को प्रोत्साहन मिलेगा, विदेशी मुद्रा आय बढ़ेगी और नौकरियां पैदा होंगी।” आइए जानें, रुपए की गिरावट से भारत को मिलने वाले तीन प्रमुख फायदे।
- निर्यात को मिलेगा जबरदस्त बढ़ावा: विदेशी बाजारों में सस्ते होंगे भारतीय सामान
रुपए की कमजोरी से भारतीय वस्तुएं और सेवाएं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में डॉलर के लिहाज से सस्ती हो जाती हैं, जिससे निर्यातकों को फायदा होता है। विशेष रूप से आईटी, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल और हैंडीक्राफ्ट जैसे सेक्टर लाभान्वित होंगे। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के अनुमान के मुताबिक, 4-5% की गिरावट से निर्यात वॉल्यूम में 10% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। 2025 में भारत का निर्यात लक्ष्य 100 अरब डॉलर पार करने का है, और यह गिरावट इसमें मददगार साबित हो सकती है। उदाहरण के तौर पर, आईटी कंपनियां जैसे टीसीएस और इंफोसिस अपनी डॉलर कमाई को अधिक रुपयों में बदल सकेंगी, जिससे उनकी आय में इजाफा होगा। - एनआरआई रेमिटेंस का मूल्य बढ़ेगा: परिवारों को मिलेगी आर्थिक राहत
देशभर में फैले 3 करोड़ से अधिक एनआरआई जब डॉलर भेजते हैं, तो कमजोर रुपए से उनकी राशि का रुपया मूल्य बढ़ जाता है। 2024-25 में रेमिटेंस 125 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है, जो जीडीपी का 3% है। केरल, तमिलनाडु और पंजाब जैसे राज्यों में यह आय महत्वपूर्ण है। गिरावट से प्रति डॉलर 90 रुपये मिलने पर 100 डॉलर का रेमिटेंस 9,000 रुपये के बजाय अधिक मूल्यवान हो जाता है। इससे घरेलू खपत बढ़ेगी, जो खुदरा और रियल एस्टेट सेक्टर को बूस्ट देगी। आर्थिक सर्वे 2022-23 के अनुसार, यह विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने में भी सहायक है। - नौकरियों का सृजन और इकोनॉमी को ओवरऑल बूस्ट: लेबर-इंटेंसिव सेक्टरों में उछाल
रुपए की गिरावट से निर्यात-आधारित उद्योगों में उत्पादन बढ़ेगा, जिससे लाखों नौकरियां पैदा होंगी। लेबर-इंटेंसिव सेक्टर जैसे गारमेंट्स, ज्वेलरी और एग्री-प्रोसेसिंग में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। नीति आयोग के अनुसार, यह गिरावट घरेलू निवेश को प्रोत्साहित करेगी और करेंट अकाउंट डेफिसिट को कम करने में मदद करेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गिरावट धीरे-धीरे हो, तो यह सप्लाई चेन को स्थिर रखते हुए आर्थिक विकास दर को 8% से ऊपर धकेल सकती है। हालांकि, आयातित कच्चे माल की लागत बढ़ने से कुछ चुनौतियां रहेंगी, लेकिन कुल मिलाकर इकोनॉमी को सकारात्मक धक्का मिलेगा।