1 घंटा हंगामा = 2.25 करोड़ रुपये स्वाहा! संसद में दिन-2 पर भी वही पुरानी कहानी, जनता का पैसा बर्बाद…

नई दिल्ली : संसद का शीतकालीन सत्र दूसरे दिन भी विपक्ष के हंगामे की भेंट चढ़ गया। विशेष गहन संशोधन (SIR) पर बहस की मांग को लेकर लोकसभा और राज्यसभा में जोरदार नारेबाजी हुई, जिससे सदनों की कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। सुबह 11 बजे शुरू हुई प्रक्रिया दोपहर 2 बजे तक चली, लेकिन बमुश्किल 1 घंटे से ज्यादा काम हुआ।

अनुमान है कि इस हंगामे से करीब 2.25 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ – ये वो पैसा है जो जनता के टैक्स से आता है। आइए, जानते हैं इस ‘ड्रामा’ से आम आदमी को कितना नुकसान हो रहा है और क्यों सत्र बार-बार पटरी से उतर रहा है।

दिन-2 का हंगामा: SIR पर विपक्ष का ‘लोकतंत्र हत्या’ नारा, सदन 2 बजे तक स्थगित
मंगलवार को विपक्ष ने फिर SIR मुद्दे को गरमाया। लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला ने सदन शुरू होते ही विपक्ष को चेतावनी दी, लेकिन कांग्रेस, DMK और अन्य सांसद वेल में कूद पड़े। नारे गूंजे – “SIR बंद करो, लोकतंत्र बचाओ!” और “वोट चोर, जवाब दो!”। राज्यसभा में भी सभापति जगदीप धनखड़ ने 2 बजे तक स्थगित करने का ऐलान किया।

प्रोटेस्ट का सिलसिला: सुबह 10:30 बजे मकर द्वार पर INDIA ब्लॉक के सांसदों ने धरना दिया। सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने SIR को “चुनावी साजिश” बताया। प्रियंका गांधी ने कहा, “संसद ड्रामा के लिए नहीं, जनता के मुद्दों के लिए है।”
सरकार का पलटवार: पीएम मोदी ने कहा, “ड्रामा से डिलीवरी नहीं होती।

विपक्ष बहस चाहता है तो व्यवस्थित तरीके से करे।” संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर “नाटकबाजी” का आरोप लगाया। फिर भी, मणिपुर GST (दूसरा संशोधन) बिल पास हो गया।

काम का हिसाब: सिर्फ कुछ बिल पेश हुए, क्वेश्चन ऑवर तक न पहुंच सके। सत्र 19 दिसंबर तक है, लेकिन 15 बैठकें ही बचीं।

हंगामे का आर्थिक नुकसान: 1 घंटा = 2.25 करोड़, जनता का पैसा डुबोया!

  • संसद चलाने का खर्चा भारी है – रोजाना 9 करोड़ रुपये से ज्यादा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 6 घंटे की बैठक पर 9 करोड़ खर्च होते हैं, यानी प्रति मिनट 2.5 लाख रुपये। अगर 1 घंटे (60 मिनट) का हंगामा हो, तो 1.5 करोड़ का सीधा नुकसान। लेकिन पुराने आंकड़ों से अपडेटेड गणना करें तो 2.6 लाख/मिनट, यानी 1 घंटे में 1.56 करोड़। आज के हंगामे को देखते हुए विशेषज्ञ 2.25 करोड़ का अनुमान लगा रहे हैं, जिसमें स्टाफ सैलरी, बिजली, सिक्योरिटी और संसाधनों का खर्च शामिल है।

कुल सत्र का खर्च: पिछले सर्दी सत्र में 90 घंटे हंगामे से 144 करोड़ का नुकसान हुआ। इस बार भी वैसा ही खतरा।
सांसदों का ‘मजा’: हर सांसद को 1.24 लाख मासिक सैलरी, फ्री हाउसिंग, ट्रैवल अलाउंस मिलता है। फिर भी, हंगामा प्राथमिकता!

जनता को नुकसान: सिर्फ पैसे का नहीं, लोकतंत्र का भी!

कानून अटके: 13 महत्वपूर्ण बिल लंबित – एटॉमिक एनर्जी बिल, कॉर्पोरेट लॉ अमेंडमेंट, इंश्योरेंस लॉ आदि। ये पास न हुए तो अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य प्रभावित।

जन मुद्दे दबे: SIR पर बहस न हो तो चुनाव सुधार रुकेंगे। दिल्ली धमाका, वायु प्रदूषण जैसे मुद्दे अनसुलझे रहेंगे।

लोकतंत्र की कीमत: विशेषज्ञ कहते हैं, “हंगामा से जनता का विश्वास घटता है। संसद जनता का मंदिर है, इसे बाजार न बनाएं।” बीजू जनता दल के सांसद जय पांडा ने कहा, “मैं नवंबर-दिसंबर की सैलरी लौटा दूंगा, क्योंकि कोई काम नहीं हुआ।”

पीएम मोदी ने सत्र शुरू करने से पहले कहा था, “यह सत्र ड्रामा-फ्री हो।” लेकिन विपक्ष इसे “जनता की आवाज” बता रहा। सवाल ये कि कब सुधरेगा संसद का स्वरूप? क्या आपको लगता है हंगामा जरूरी है या बहस? कमेंट्स में बताएं!