छठ मैया कौन हैं और क्यों की जाती है मैया के साथ सूर्यदेव की पूजा, पढ़ें पौराणिक कथा

नई दिल्ली :: छठ पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। दिवाली के छह दिन बाद आने वाले इस महापर्व को छठ कहा जाता है। यह चार दिवसीय पर्व है जिसमें व्रती पूरी शुद्धता और पवित्रता का पालन करते हैं। पारंपरिक नियमों के अनुसार छठ व्रत बहुत कठोर होता है, इसलिए इसे महापर्व और महाव्रत भी कहा जाता है।

छठी मैया जिन्हें षष्ठी माता भी कहा जाता है, बच्चों की रक्षक देवी मानी जाती हैं। मान्यता है कि ये सूर्य देव की बहन हैं और इन्हें प्रसन्न करने के लिए व्रती सूर्य देव की पूजा और जल की महत्ता को समझते हुए उन्हें साक्षी मानकर उपासना करते हैं। छठी मैया की पूजा नदी, तालाब या किसी पवित्र जल स्रोत के किनारे की जाती है। इनकी आराधना से संतान को लंबी आयु, स्वास्थ्य और सफलता की प्राप्ति होती है।

छठ पर्व से जुड़ी कथाएं
छठ पर्व की जुड़ी एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक राजा था जिसका नाम प्रियंवद थे जिनके कोई संतान नहीं थी। इसके बाद महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर दी। इस यज्ञ का प्रभाव से उन्हें संतान की प्राप्ति तो हुई लेकिन, वह मरी हुई थी। राजा प्रियंवद बच्चे के वियोग में प्राण त्यागने लगे। उस वक्त ही वहां देवसेना प्रकट हुई और कहा कि हे राजन आप मेरी पूजा करें और बाकी लोगों को भी मेरी पूजा के लिए प्रेरित करें। संतान की इच्छा रखकर राजा ने देवी षष्ठी का व्रत किया जिसके प्रभाव से उन्हें संतान की प्राप्ति हुई। जब से संतान की कामना के लिए भी छठ पूजा की जाने लगी।

छठी मैया की पूजा के माध्यम से व्रती भगवान सूर्य को धन्यवाद देते हैं और उनके साथ माता गंगा या यमुना को साक्षी मानकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। यह पूजा संतान और परिवार की रक्षा के लिए की जाती है। शिशु के जन्म के छह दिन बाद भी इन्हीं देवी की आराधना होती है। इस व्रत को करने से संतान को स्वास्थ्य, दीर्घायु और सफलता प्राप्त होती है।