विपक्षी दलों ने पूर्व जज रेड्डी को इसलिए उम्मीदवार बनाया है क्योंकि वह अविभाजित आंध्र प्रदेश से हैं और उनकी उम्मीदवारी को लेकर विपक्ष तेलुगु देशम पार्टी में दुविधा पैदा करना चाहता है।
Written By: Rajat Sharma@RajatSharmaLive
Published : Aug 19, 2025 18:18 IST, Updated : Aug 19, 2025 18:18 IST

उपराष्ट्रपति पद के लिए 9 सितम्बर को एनडीए उम्मीदवार सी. पी. राधाकृष्णन और विपक्ष के उम्मीदवार पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जी. सुदर्शन रेड्डी के बीच सीधा मुकाबला होगा। मंगलवार को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खर्गे ने रेड्डी की उम्मीदवारी का ऐलान किया और कहा कि विपक्षी खेमे ने सर्वसम्मति से यह चयन किया है। उधर, सी. पी. राधाकृष्णन की उम्मीदवारी पर बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने मुहर लगा दी है।
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विपक्षी दलों ने पूर्व जज रेड्डी को इसलिए उम्मीदवार बनाया है क्योंकि वह अविभाजित आंध्र प्रदेश से हैं और उनकी उम्मीदवारी को लेकर विपक्ष तेलुगु देशम पार्टी में दुविधा पैदा करना चाहता है। लेकिन मंगलवार को ही टीडीपी अध्यक्ष चंद्रबाबू नायडु के पुत्र एन. लोकेश ने सोशल मीडिया पर लिखा कि एनडीए एकजुट है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह विरोधी दलों के नेताओं से बात करके राधाकृष्णनन के नाम पर सहमति बनाने की कोशिश अब भी कर रहे हैं। लेकिन विपक्ष उपराष्ट्रपति चुनाव में सत्ता पक्ष को टक्कर देने के मूड में नज़र आ रहा है।
उपराष्ट्रपति चुनाव के आंकडों पर नज़र डालें तो सीपी राधाकृष्णन का उपराष्ट्रपति बनना तय है। बीजेपी और उसके साथी दलों के पास अच्छा खासा बहुमत है। कांग्रेस और उसके साथी दलों के लिए CPR का विरोध करना मुश्किल होगा क्योंकि एक तो उनका सार्वजनिक जीवन साफ सुथरा है। दूसरा, वो ओबीसी समाज से आते हैं, तमिलनाडु के हैं लेकिन उनकी जाति का प्रभाव आंध्र प्रदेश में भी है। विपक्ष का विरोध सांकेतिक होगा और CPR के उम्मीदवार होने की वजह से आक्रामक नहीं हो पाएगा।
CPR को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने का एक और पहलू भी है। बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को यह एहसास हुआ है कि अपने पुराने लोगों को ही जिम्मेदारी के पद देने चाहिए। जगदीप धनखड़ और सत्यपाल मलिक जैसे experiment फेल हुए हैं। ये एहसास आने वाली राजनीतिक नियुक्तिय़ों में भी दिखाई देगा।
कोई चुनाव आयोग को न धमकाये: लोकतंत्र के लिए ज़रूरी
अब बात करते हैं चुनाव आयोग के खिलाफ विपक्ष के हल्लाबोल की। विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने का शिगूफा छोड़ा है। पहले विपक्ष ये मांग कर रहा था कि चुनाव आयुक्त मीडिया के सामने आएं, विपक्ष के सवालों के जबाव दे, रविवार को ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रैंस की, सारे सवालों के जबाव दिए, तो अब विपक्ष ने महाभियोग की बात शुरू कर दी।
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने के पीछे विपक्ष के दो तर्क हैं। पहला ये कि चुनाव आयोग बीजेपी की B टीम के तौर पर काम कर रहा है, और दूसरा तर्क ये है कि उसकी शिकायतों को सुनने के बजाए चुनाव आयोग विपक्ष के नेताओं को धमका रहा है। इसलिए ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने पर विरोधी दलों के नेता विचार कर रहे है। हालांकि विपक्ष इस विकल्प का इस्तेमाल करेगा या नहीं, इस पर विरोधी दलों के नेता खुलकर नहीं बोल रहे हैं।
विपक्ष के निशाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त इसलिए हैं क्योंकि विपक्ष के जो नेता SIR (special intensive revision) के मुद्दे पर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं, उसे चुनाव आयोग लगातार काउंटर कर रहा है, उसका जवाब दे रहा है। राहुल गांधी ने पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन देकर चुनाव आयोग पर जो सवाल उठाए, वोट चोरी का इल्जाम लगाया, चुनाव आयोग ने रविवार को प्वाइंट बाई प्वाइंट जवाब दिया था। हालांकि ज्ञानेश कुमार ने राहुल गांधी का नाम नहीं लिया था, लेकिन उन्होंने साफ कहा था कि जो डेटा दिखाकर आरोप लगाए गए, वो डेटा चुनाव आयोग का नहीं है।
CEC ने कहा कि वोट चोरी का आरोप लगाने वाले या तो सात दिन के भीतर हलफनामा दें या फिर देश से माफी मांगे, तीसरा कोई विकल्प नहीं है। ज्ञानेश कुमार ने कहा कि अगर 7 दिन में हलफनामा नहीं मिला तो इसका मतलब है कि सारे आरोप निराधार हैं। सोमवार को विरोधी दलों के नेताओं ने एक साझा प्रेस कॉन्फ्रैंस में आरोप लगाया कि चुनाव आयोग विपक्षी दलों को धमकी दे रहा है।
अगर आप चुनाव आयोग से जुड़े केस को सिलसिलेवार तरीके से देखेंगे, तो समझ में आ जाएगा कि असली गड़बड़ कहां है। राहुल गांधी ने मीडिया में चुनाव आयोग पर आरोप लगाए। चुनाव आयोग को publicly चोर कहा। पहले चुनाव आयोग ने off record briefing में जवाब दिए, तो कहा गया कि चुनाव आयोग सामने क्यों नहीं आता? जवाब क्यों नहीं देता? जब CEC ने मीडिया में आकर जवाब दिए, तो कह रहे हैं कि वो बीजेपी की भाषा बोल रहे हैं।
मुझे लगता है कि एक संवैधानिक संस्था का प्रमुख होते हुए भी ज्ञानेश कुमार ने बड़े धैर्य से सारे सवालों को सुना, खुल कर जवाब दिए, सवाल पूछने वालों को डांटा नहीं, किसी को कांग्रेस का एजेंट नहीं कहा, बड़ी शालीनता से अपनी बात कही। जहां तक धमकाने की बात है तो पिछले 7 दिन से राहुल गांधी चुनाव आयोग को धमका रहे हैं। अगर ज्ञानेश कुमार ने कह दिया कि आपके पास शपथ पत्र देने या माफी मांगने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, तो कौन सा पहाड़ टूट गया?
न तो किसी को चुनाव आयोग को डराने की कोशिश करनी चाहिए और न ही चुनाव आयोग को किसी राजनीतिक दल को डराना चाहिए। अगर नेताओं को आरोप लगाने का हक़ है तो चुनाव आयोग से उनका जवाब देने का अधिकार कैसे छीना जा सकता है? (रजत शर्मा)