नई दिल्ली: संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) और सरकारी नौकरियों में आरक्षण के नियमों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और स्पष्ट फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि यदि कोई उम्मीदवार चयन प्रक्रिया के किसी भी चरण (जैसे प्रीलिम्स या मेन्स) में आरक्षित श्रेणी के तहत मिलने वाली छूट (जैसे कम कट-ऑफ, आयु सीमा में छूट या अतिरिक्त प्रयास) का लाभ उठाता है, तो वह बाद में ‘जनरल’ (अनारक्षित) सीट पर दावा नहीं कर सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह फैसला 2013 की भारतीय वन सेवा (IFS) परीक्षा से जुड़े एक विवाद पर आया है। जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें कहा गया था कि आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवार को बेहतर रैंक के आधार पर जनरल सीट मिलनी चाहिए।
विवाद की जड़: एक उम्मीदवार (जी. किरण) ने प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) में एससी (SC) कैटेगरी के कम कट-ऑफ का लाभ लेकर क्वालीफाई किया था।
मेरिट का पेच: फाइनल रिजल्ट में उनकी रैंक जनरल कैटेगरी के कई उम्मीदवारों से बेहतर आई। इसके आधार पर उन्होंने ‘होम कैडर’ की जनरल सीट पर दावा किया।
कोर्ट का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि उम्मीदवार ने पहले चरण में ही ‘आरक्षण की बैसाखी’ का इस्तेमाल कर लिया था, इसलिए अब वह ‘ओपन कॉम्पिटिशन’ (General Category) के हकदार नहीं रह जाते।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां
अदालत ने अपने फैसले में ‘डबल बेनिफिट’ (दोहरा लाभ) की अवधारणा को खारिज करते हुए कुछ महत्वपूर्ण बातें कहीं:
एक बार का लाभ: यदि आपने परीक्षा के किसी भी स्तर पर रियायती मानक (Relaxed Standards) अपनाए हैं, तो आप पूरी प्रक्रिया के लिए उसी श्रेणी के माने जाएंगे।
मेरिट और समानता: जनरल कैटेगरी ‘मेरिट’ की श्रेणी है। इसमें वही आ सकते हैं जिन्होंने शुरू से अंत तक बिना किसी छूट के सामान्य मानकों पर मुकाबला किया हो।
नियम 14 (ii): कोर्ट ने यूपीएससी के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षित श्रेणी का व्यक्ति तभी जनरल सीट ले सकता है जब उसने किसी भी स्तर पर कोई रियायत न ली हो।
उम्मीदवारों पर क्या होगा असर?
इस फैसले के बाद अब तस्वीर साफ है:
तबादला (Migration) संभव नहीं: अगर प्रीलिम्स में आपने अपनी कैटेगरी का कट-ऑफ इस्तेमाल किया है और आपके अंक जनरल कट-ऑफ से कम थे, तो मेन्स या फाइनल लिस्ट में अधिक अंक आने पर भी आपको जनरल सीट नहीं मिलेगी।