राजस्थान : राजस्थान में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के अरावली पर्वतमाला की परिभाषा संबंधी फैसले ने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। कोर्ट ने अरावली की पहाड़ियों को संरक्षित क्षेत्र मानने के लिए न्यूनतम 100 मीटर ऊंचाई की शर्त को स्वीकार किया है। इससे राज्य की करीब 90% छोटी-मध्यम ऊंचाई वाली अरावली पहाड़ियां संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकती हैं, जिससे खनन गतिविधियों को बढ़ावा मिलने का खतरा है।
इस मुद्दे पर कांग्रेस ने ‘सेव अरावली’ अभियान चलाया और प्रदेशभर में प्रदर्शन किए। उदयपुर, सीकर समेत कई जिलों में प्रदर्शनकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया और चेतावनी दी कि अगर अरावली नहीं बची तो आने वाली पीढ़ियां गंभीर संकट झेलेंगी।
दिलचस्प बात यह है कि BJP के कुछ नेताओं ने भी अपनी सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने इसे काल्पनिक मुद्दा बताया, लेकिन कई रिपोर्ट्स में कहा गया कि BJP के कुछ विधायक और नेता पर्यावरण संतुलन बिगड़ने की आशंका जता रहे हैं। स्वतंत्र विधायक रविंद्र सिंह भाटी ने इसे क्षेत्रीय पर्यावरण के लिए गंभीर झटका करार दिया और अरावली बचाने का संकल्प लिया।
पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली राजस्थान के फेफड़े की तरह है – यह भूजल रिचार्ज करती है, रेगिस्तान के फैलाव को रोकती है और धूल भरी आंधियों से बचाती है। अगर छोटी पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हुईं तो खनन बढ़ेगा, जलस्तर गिरेगा और जैव विविधता को नुकसान पहुंचेगा।
केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि अरावली पूरी तरह सुरक्षित है और संरक्षण जारी रहेगा, लेकिन विपक्ष इसे खनन लॉबी को फायदा पहुंचाने की साजिश बता रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजस्थान की राजनीति को और गर्मा सकता है।
राजस्थान: अरावली संरक्षण पर BJP के कुछ नेताओं ने अपनी ही सरकार पर उठाए सवाल, बोले- ‘अगर यह मांग पूरी नहीं हुई तो…’
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